पेट्रोल-डीजल पर आयी इस रिपोर्ट को पढ़कर आपकी आँखें फटी रह जाएंगी, माफ़ी मांगेगी अब कांग्रेस !

ई दिल्ली : पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमत को लेकर कोहराम मचा हुआ है. कुछ लोग कह रहे हैं कि केंद्र सरकार जनता को लूट रही है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम हुई हैं. इसलिए घरेलू बाजार में भी दाम कम होने चाहिए. मीडिया ने भी इस बात को खूब उछाला. लेकिन क्या ये दावे सच हैं? इस बात की पड़ताल करने के लिए हमने पेट्रोलियम इंडस्ट्री के कई जानकारों से बात की. जो नतीजे सामने आए, उन्हें देखने के बाद मोदी सरकार पर कीचड उछालने वाले कोंग्रेसी नेताओं और बिकाऊ मीडिया को देश से माफ़ी मांगनी पड़ सकती है.

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कोंग्रेसी नेताओं और मीडिया द्वारा फैलाया गया झूठ !
सबसे पहले तो आपको बता दें कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें अब सरकार नहीं, बल्कि सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां तय करती हैं. इसका एक ऑटोमेटेड फॉर्मूला है. साथ ही यह भी जानना जरूरी है कि कच्चे तेल की रिफाइनिंग, ढुलाई के बाद उस पर केंद्र सरकार का एक्साइज टैक्स और राज्यों का वैट लगता है. केंद्र चाहता था कि पेट्रोलियम पदार्थों को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाए, लेकिन राज्यों ने इसका कड़ा विरोध किया था. इन राज्यों में लगभग सभी गैर-बीजेपी शासित राज्य जैसे बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब शामिल हैं. ताजा हालात में सरकार ने फिर से कोशिश शुरू की है कि जीएसटी पर आम राय बनाने की कोशिश की जाए.

क्या वाकई कच्चा तेल सस्ता हुआ है?
यह बात पूरी तरह गलत है कि कच्चे तेल का भाव कम हुआ है. ये झूठ मीडिया ने गढ़ा है. यहां तक कि इकोनॉमिक टाइम्स जैसे अखबार ने भी यह झूठ छापा. खुद पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसे लेकर नाराजगी भी जताई थी. सच यह है कि बीते तीन महीने में क्रूड का इंटरनेशनल भाव 13 फीसदी बढ़ा है. इसके अनुपात में पेट्रोल 18 और डीजल 20 फीसदी महंगा हुआ.

यह अंतर इसलिए है क्योंकि इस दौरान ढुलाई और रिफाइनिंग के खर्चे में भारी बढ़ोतरी हुई है. साथ ही तेल कंपनियों ने पेट्रोल पंप मालिकों की डीजल मार्जिन भी बढ़ाई है. कम मुनाफे के कारण कई साल से पेट्रोल पंप पर काम करने वालों का वेतन नहीं बढ़ा था. ये बढ़ोतरी इसी शर्त के साथ हुई कि इससे कर्मचारियों का वेतन बढ़ाया जाएगा. साथ ही अमेरिका के टेक्सास में समुद्री तूफान हार्वे और इरमा के कारण रिफाइनरी क्षमता में 13 फीसदी की कटौती हुई है. इसका असर पूरी दुनिया के बाजार पर पड़ा है.

समझिए तेल की कीमत के खेल को !
मीडिया और सोशल मीडिया पर कई लोग 4 से 5 साल पुराना आंकड़ा देते हुए कहते हैं कि उस समय कच्चा तेल 100 डॉलर से ऊपर था, लेकिन दाम 60 रुपये था, जबकि आज 50 डॉलर है लेकिन दाम 70 रुपये कैसे हो गया. दरअसल ये ऐसा झूठ है जो पहली नजर में हर किसी को सच लगता है. क्योंकि बाकी खर्चों में भारी बढ़ोतरी हुई है. आज कच्चा तेल प्रति बैरल 48 डॉलर पर है. एक बैरल का शिपिंग चार्ज औसतन दो डॉलर आता है. इस तरह भारत की रिफाइनिंग कंपनियों तक आते-आते दाम 50 डॉलर हो जाता है. अगर डॉलर की कीमत 64 रुपये लगा लें तो प्रति बैरल दाम 3200 रुपये होगा. एक बैरल से लगभग 159 लीटर पेट्रोल निकलता है.

 

भारत में एक लीटर की रिफाइनिंग पर औसत खर्च 20 रुपये के करीब है. इसमें ट्रांसपोर्ट, टैक्स और तेल कंपनी का मार्जिन भी शामिल है. इसके बाद प्रति लीटर कीमत 30 रुपये हो जाती है. इस तेल पर भारत सरकार लगभग 22 रुपये का एक्साइज ड्यूटी लगाती है. इससे कीमत 52 रुपये प्रति लीटर हो जाती है. एक्साइज टैक्स का भी 42 फीसदी हिस्सा केंद्र को राज्य सरकारों को वापस लौटाना होता है. इसके अलावा राज्य सरकारें वैट लगाती हैं. हर राज्य में यह अलग-अलग है. दिल्ली में यह 27 फीसदी यानी करीब 15 रुपये है. पेट्रोल पंप डीलर को हर लीटर पर साढ़े तीन रुपये से कुछ कम कमीशन मिलता है. वैट और डीलर मार्जिन जोड़कर दिल्ली में दाम 70.50 रुपये हो गया.

मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में महंगा तेल !
यहां यह जानना जरूरी है कि कई बड़े देशों में सरकारें एक रणनीति के तहत पेट्रोल और डीजल का दाम थोड़ा ज्यादा रखती हैं. फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन समेत ज्यादातर यूरोपीय देशों में इसकी कीमत अधिक है. यूरोप के करीब-करीब सभी देशों में पेट्रोल-डीजल 100 रुपये प्रति लीटर के ऊपर है. नॉर्वे में तो ये 130 रुपये प्रति लीटर से भी ज्यादा है. अमेरिका और रूस तेल उत्पादक देशों में से हैं. लेकिन वहां भी इसकी कीमत भारतीय हिसाब से 50 रुपए प्रति लीटर के आसपास रहती है. यहां तक कि चीन में भी तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है और वहां इसका भाव 70 रुपये से कुछ ही कम है.

जिन देशों में तेल सस्ता है वो ऐसे हैं जो तेल का उत्पादन करते हैं और उन्हें इसे किसी दूसरे देश से खरीदना नहीं होता. इनमें वेनेजुएला, सऊदी अरब और कुवैत जैसे देश हैं. इसके अलावा उन देशों में भी तेल सस्ता है जिनकी अर्थव्यवस्था फिसड्डी है. जैसे कि पाकिस्तान. वहां पर पेट्रोल सिर्फ 44 रुपये प्रति लीटर है. भारत, जापान और ब्राजील जैसे देशों में पेट्रोल लगभग बराबर भाव पर है.

तेल का टैक्स किस काम आ रहा है ?
दरअसल यही वो सवाल है जिसमें इस बात का जवाब छिपा है कि अधिक दामों के पीछे क्या तर्क है? दरअसल तेल से मिलने वाले टैक्स का इस्तेमाल सरकारी खजाने के भारी-भरकम घाटे को पाटने और गरीबों के कल्याण की योजनाओं पर हो रहा है. सरकारी खजाने का घाटा यानी Fiscal Deficit को 3 फीसदी से नीचे लाने का लक्ष्य रखा गया है. मनमोहन सरकार ने विरासत में 4.5 फीसदी का घाटा दिया था. किसी भी अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए जरूरी है कि यह कम से कम हो. मोदी सरकार इस लक्ष्य को इसी साल पूरा कर लेगी.

कैसे सस्ता हो सकता है पेट्रोल-डीजल !
कच्चे तेल और डॉलर के भाव पर सरकार का बहुत नियंत्रण नहीं होता. इसी तरह ढुलाई और रिफाइनिंग का खर्च भी कम नहीं होने वाला. ऐसे में अगर सरकार दाम करना चाहे तो उसके पास यही तरीका है कि वो टैक्स घटाए. 2016 से पहले सरकार ने इसे बढ़ाकर लगभग दोगुना कर दिया था. तब तर्क था कि कच्चे तेल का दाम बहुत गिर गया है. अब जब ये चढ़ रहा है तो सरकार टैक्स कम करके जनता को बोझ से राहत दिला सकती है. अगर फौरन कच्चे तेल के दाम गिरना शुरू नहीं होते तो अगले 1-2 हफ्ते में ऐसा करना भी पड़ेगा. साथ ही कोशिश करनी होगी कि पेट्रोल-डीजल पर भी जीएसटी लागू हो जाए. अगर ऐसा हो गया तो ये बड़ी राहत होगी.